मुझे उम्मीद नही है..!

मुझे उम्मीद नही है,
कि वे अपनी सोच बदलेंगे..
जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..!
वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..!

उम्मीद नही करता उनसे,
कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे..
जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..!
लिख देंगे फिर एक लम्बी जांच, ...पैसे आप खरच लेना..!

क्यों हो उम्मीद उनसे भी,
कि वे अपनी लट्ठमार भाषा बदलेंगे..
जिन्हें चौकस रहना था हर तिराहे, नुक्कड़ पर..!
खाकी खखारकर डांटेगी,...गाँधी आप लुटा देना..!

उम्मीद नही काले कोटों से,
कि वे तारिख पे तारीखें नही बढ़वाएंगे..
उन्हें  संवाद कराना था वाद-विवादों पर..!
वे फिर अगले  महीने बुलाएँगे...सुलह आप करा लेना..!

कत्तई उम्मीद नही उन साहबों से,
कि वे आम चेहरे पहचानेंगे..
योजनाओं को जमीन पे लाना था उन्हें...!
वे मोटी फाइलें बनायेंगे...सड़कें आप बना लेना..!

अब क्या उम्मीद दगाबाजों से,
कि वे विकास कार्य करवाएंगे..
जनता को गले लगाना था जिनको ..!
वे बस लाल सायरन बजायेंगे, ..कानून आप बना लेना..!

उम्मीद तो बस उन लोगों से है,
जो तैयार है बदलने के लिए इस क्षण भी..
जो जानते हैं कि शुरुआत स्वयं से होगी..!
वे खास लोग एक आंधी लायेंगे, पंख आप फैला लेना..!


(Hope Painting by Amy Kopp)

11 comments:

Arvind Mishra ने कहा…

नए शिल्प और तेवर की नयी सृजनात्मकता -और एक सकारात्मक आश्वस्ति लिए हुए -यही है मनुष्य की जिजीविषा ! यही तो है असली कविता ....गगन निहारेगा खुलते पंख और परवाज को ...

डॉ .अनुराग ने कहा…

देर लगी आने में तुमको....शुक्र है फिर भी आये तो........

गोया इन्ही तेवरों की एब्सेंट लगी थी .....कब से इस कंप्यूटर के पन्नो में ....
and yes batsman in form......indeed!!!!

Manish Kumar ने कहा…

behtareen !aap kavita karte hain ye aaj hi jana

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

....इस कविता को समझना जितना सरल है उतना ही कठिन है इसकी धार को भीतर तक महसूस करना।
....वाक्यों के नवप्रयोग सहसा उत्तेजित कर देते हैं..
....खाकी खखारकर डांटेगी,...गाँधी आप लुटा देना..!

Udan Tashtari ने कहा…

अद्भुत! वाह!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

ummmed ke bahane ke aapne kai visangtiyon ko chua hai ...sabse badi baat aap kekahne ka tareeka hai ...nayapan hai ... aur is nayepan ka lamba anubhav nazar aata hai aapme...behtareen

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

पहले तो कविता में इंगित समाज में कर्ता-धर्ता बने इंगित बुद्धिजीवियों (?) पर एक शेर ( किसका है , याद नहीं ! ) ....मुलाहिजा ,,,,,,,,,,
'' बुद्धिजीवी फिर इकट्ठा हो गए हैं ,
कुछ जरूरी प्रश्न ताले जायेंगे | ''
......................
एक कच्चापन जो 'तितर बितर मन एक बडबडाहट' में है , वह यहाँ भी है , इस मूड की कविताओं का 'खिलाड़ी' नहीं हूँ इसलिए जोर देकर तो कुछ नहीं कह सकूंगा ! एक बात यह भी मन में उठती है कि कच्चेपन की विसंगति का बयान - इस कविता का - अगर कंटेंट है तो उसके पकेपन के साथ गढ़ाव न होना रचना के साथ एक न्याय भी हो सकता है ! बाकी गुणी लोगों ने कह ही दिया है , अच्छी है कविता , अलग से क्या कहना !

एक निवेदन जरूर करूंगा कि ये ''........'' ( डोट ) कविता के कसाव में बड़े बाधक बने हैं ! नहीं समझ पाया कि टूटी वाक्यावली के दोष को देखूं या 'डोट' को ही सब मान लूँ , यानी 'बैलेंस' | कहीं यह सब भी प्रयोग तो नहीं है आपका ?? यदि है तो यह प्रयोग के तौर पर ही संप्रेषित हो रहा है ??

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

**टाले hogaa | ताले naheen !

रंजना ने कहा…

इस ओज,उर्जा और भाव का प्रसार असंख्य हृदयों में हो...ईश्वर करें !!!

मुग्ध कर लिया आपकी रचना ने....

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

अमरेन्द्र जी, कच्चापन स्वीकारता हूँ. कुछ अभ्यास का कच्चापन है कुछ मन का कच्चापन है. कुछ जीवन का भी कच्चापन है. अब यह कच्चापन कितना छुपाऊं. यही है, जो है. आप मार्गदर्शित करते रहें, बस और क्या चाहिए इस कच्ची कविता से...!

तरुण भारतीय ने कहा…

उमीद मुझे भी नहीं है भाई साहब....... अब परिवर्तन होना चाहिये

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