आज की रात देखा मैंने ये स्वप्न : कोई बतायेगा इसके निहितार्थ



.....सड़क पार कर रहा हूँ, कुछ लोगों के साथ .इनमें एक मेरे आदरणीय मित्र हैं. बाकी अनजाने लोग हैं. उन अनजाने लोगों का मुखिया एक व्यक्ति जो मेरे मित्र का परिचित है, और सफ़ेद कुरता जैसे छात्र-नेता लोग पहनते हैं, पहने हुए है. उसका रुख अच्छा नही है, हम दोनों के लिए. हमें कहीं ले जाया जा रहा है. मेरा इस प्रकरण से कोई लेना-देना नही है. न ही मुझे कहीं जाने के लिए बाध्य किया गया है. पर मै अपने मित्र के साथ जा रहा हूँ, उन्हें हिम्मत बधाते हुए. अचानक उस टोली में मुझे भी मेरा एक पुराना परिचित दिखता है जो उन लोगों के साथ है. यह परिचित व्यक्ति बेहद दुष्ट है. 


.....फिर मैंने देखा मेरे मित्र को एक आगे से खुले हुए कमरे में एक कुर्सी पर बिठा दिया गया है. मेरे मित्र शांत-गंभीर बैठे हुए हैं. उनकी मुद्रा से प्रतीत होता ही जैसे वे कहना चाह रहे हों कि-क्या डर; सांच को आंच नही. बारिश हो रही है. अब परिदृश्य में केवल तीन लोग हैं. मै बाहर भीग रहा हूँ. वह लंबा, कुर्ता वाला व्यक्ति एक छोटे से टेंट के नीचे बैठा है. मै सोच रहा हूँ कि उस व्यक्ति से पूछकर मै भी उस कमरे में बैठ जाऊं. पर वह मेरी उपेक्षा करता है. 

मुझे एहसास होता है कि मेरे मित्र ने उस व्यक्ति की नौकरी लगवाई थी. पर चूँकि वह योग्य नही था, तो मेरे मित्र से जलता था. मेरे मित्र भी उसे जितना चाहिए था शायद उतनी ईज्जत नही देते थे. सिस्टम में जाकर अब वह व्यक्ति काफी शक्तिशाली हो चुका था. काफी राजनीतिक पकड़ हो चुकी थी उसकी. 

इस स्थान से सटे हुए रेलवे लाईन गुजरती है. एक ट्रेन गुजर रही है, उसमें लोग बैठे हुए हैं और सभी लोग नीचे देख रहे हैं...नीचे, रेलवे लाईन के बगल में एक उथला गड्ढा है. जहाँ कई छात्रों की लाशें पड़ी हैं. कुछ रोजगार मांगने की तख्तियों के साथ अनगिनत किताबें भी बिखरी हुई हैं.

बारिश हो रही है. अचानक वह मुझे कमरे में बैठने की ईजाजत दे देता है. मै अपने मित्र के पास बैठ जाता हूँ. कमरा , जो आगे से पूरा खुला होता है, अब एक पर्दा डाल दिया जाता है. 


अचानक हमारे कमरे का पर्दा हटाया जाता है तो ...दिखता है कि सामने भीड़ जुटी है. धुप है. नेता, पत्रकार, जनता और मीडिया जन कुर्सियों पर बैठे हैं और हम पर चिल्ला रहे हैं. हम दोनों पर ११ वर्ष के बच्चियों के साथ बलात्कार का झूठा आरोप है. 


...मेरी आँख खुल जाती है. इस तरह की चीजें हाल के दिनों में मैंने सोची भी नही हैं. हाँ ट्रेन कई बार सपने में आयी है. 

मेरी जिज्ञासा है, कोई यदि बता सके तो ठीक ..वैसे चाहूँगा इसकी मनोवैज्ञानिक अथवा ज्योतिषीय व्याख्या ही हो. मुझे ब्लॉग-जगत पर विश्वास है सो रख दिया यह सपना आप लोगों के सामने. 

5 comments:

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

विलंबित और चिर-प्रतीक्षित प्रखर-आखर सुकून दे रहे हैं ! बाकी फिर आकर बकूंगा !

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

कह के गया था कि बकने आउंगा | विलंबित ही आया पर बक पाना आसान नहीं लग रहा ! सारी घटना होने के एक-दो दिन पहले ही इतनी झलक कहाँ से तुम्हें मिल गयी , हैरत में हूँ !

एक ही चीज कहूंगा कि जीवन में 'भावुकता' से बचना | वह तुम्हारा मित्र अपराजेय था , कर्ण की तरह | नियति भी क्रूर होती है | कर्ण का दोष क्या था ? पैदा हुआ तो नदी में फेंक दिया गया ..........कुंडल कवच तक छीन लिए गए , उसने सब कुछ तो खुशी खुशी ही दान दे दिए थे | पत्रं-पुष्पं-फलं-तोयं ! बस समय ने पलटा खाया और जो अपराजेय था वह 'आरोपित' हो गया |

तुम्हारे मित्र ने अपने स्तर से बहुत नीचे उतर कर एक झूठे व्यक्ति को अपने अंतःकरण के सत्य तक आने की छूट दे दी थी | यहीं हो गया था झूंठ का सौदा | अज्ञानता और भावुकता वश सच को झूंठ के हाथों गिरवी रखते समय ही आपका मित्र पराजित हो गया था | 'आरोप' उस पराजय का आसुरी-उद्घोष था जो आज नहीं तो कल होता ही ! हुआ भी वही !

अब सवाल तुम क्यों फंसे ?
--- 'मोह सकल ब्याधिन कर मूला' ! मोह ( जिसमें मुख्य भूमिका अज्ञान और भावुकता की है ) के वशीभूत होकर तुम्हारा मित्र फंस गया , किसी के मोहफांस में बंधकर , निर्दोष होकर भी दोषी सिद्ध हुआ ! और तुम अपने मित्र के मोह में फंस गए | तुमने मित्रता के चलते एक अलग मोह भरी गलती कर डाली , हर हालत में मित्र का साथ देने की ! जैसे कर्ण दुर्योधन का साथ देने की सजा का भागी हुआ ठीक वैसे ही ! इसलिए तुम भी आरोपी बने | 'मोह' से सदैव बचना !

अब तुम्हारा मित्र मणिहीन अशत्थामा की तरह है ! फिर भी 'अमर' सा ही है ! आगे जीवन लंबा है , कठिन चुनौतियां हैं , कर्म-पथ पर सब अकेले ही चलते हैं , इसलिए आगे किसी तरह के 'मोह' में मत फसना ! ढेरों शुभकानाएं !

शरद कोकास ने कहा…

सपनों का कभी विश्लेषण नहीं करना चाहिये इसलिये कि हमारे अवचेतन में इतनी सारी चीज़ें होती है कि वे सपनों में कभी क्रमवार नहीं आती ।सपनो पर मनोविज्ञान में बहुत कुछ लिखा गया है , पढ़ डालिये ।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

कोकास जी की बात से असहमत हूँ !
एक 'टेक्स्ट' / 'रचना' मानकर सपनों का विश्लेषण किया जा सकता है ! अगर इससे काम की चीजें हासिल हो जाएँ तो गलत क्या !

shyam1950 ने कहा…

...
स्वप्न साहित्य का भी बीज होता है, यदि देखना आये तो !.. कई बार यह आगत को संकेतित कर जाता है.. घटना अपना शब्द-विन्यास पहले चुन लेती है, घटती बाद में है .. सड़क पार करना विचार का प्रति-विचार में प्रवेश होता है .. ट्रेन भी विचार-धारा और विचार-प्रवाह को संकेतित करती है.. खड्डा देखना अपकर्ष या लांछन जैसा कुछ होता है ... यथासम्भव नकारात्मक स्वप्न से बचना चाहिए ! "मंत्र महामणि विषय व्याल के मेटत कठिन कुअंक भाल के" मानस में इसके उपाय हैं .. स्वप्न एक प्रकार के थर्मामीटर का काम भी करते है आपकी सोच में नकारात्मक प्रभावों के सूचक भी होते हैं.. स्वप्नों का अधिक पीछा भटका भी सकता है

अमरेन्द्र जी ने जो लिखा वो विश्लेषण बहुत अच्छा लगा !

मुझे लगता है यदि स्वप्न है तो परलोक भी होना ही चाहिए और वह स्वप्न संसार से भी सूक्ष्म संसार होना चाहिए !
... फिलहाल तो मैं न्वोत्पल क्यों बंद है यही पूछने आया था !

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